सूक्ष्म , लघु और मध्यम उद्यम और कोरोना वायरस

प्र1. COVID19 के प्रकोप का भारतीय अर्थव्यवस्था पर, विशेष रूप से छोटे और मध्यम व्यवसायों पर क्या प्रभाव है?

कॉरोनोवायरस के प्रकोप को रोकने के लिए भारत में वैश्विक संगरोध और 5-सप्ताह के राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन ने उद्योगों को प्रभावित किया है और ऑपरेशन सचमुच एक ठहराव में आ गए हैं। ये कुछ क्षेत्रों में घरेलू और बाहरी मांग के झटके, उत्पादन बंद और नौकरी के नुकसान के साथ अभूतपूर्व समय हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था से महामारी 100+ bn USD मिटाए जाने की संभावना है

भारत में MSME क्षेत्र में प्रभाव और भी अधिक बढ़ गया है जो कृषि क्षेत्र के बाद दूसरा सबसे बड़ा नियोक्ता है और अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। घरेलू बिक्री में 90% की गिरावट आई है और आपूर्ति श्रृंखला में रुकावट और श्रम के मुद्दे लाखों नौकरियों को खतरे में डाल रहे हैं, जिसके परिणामस्वरूप लाखों टन वस्तुएं जैसे गेहूं, दालें और चावल और खराब होने वाली आवश्यक वस्तुएं बर्बाद हो रही हैं और खाद्य मुद्रास्फीति के स्तर को खतरे में डाल रही हैं। रिकॉर्ड ऊंचाई।

हाल ही में एसओएलवी में, हमने अपने मंच पर एसएमई के साथ एक अध्ययन किया और पाया कि उनमें से ज्यादातर हेडकाउंट में कमी जैसे गंभीर उपायों पर विचार कर रहे हैं, और आगे उनके संकटों को बढ़ा रहे हैं। यदि वर्तमान परिदृश्य जारी रहता है, तो 90% से अधिक एसएमई के पास केवल 3 महीने तक बनाए रखने के लिए कैशफ्लो हैं और उनमें से एक महत्वपूर्ण संख्या जो पहले से ही ऋणी हैं, शायद अपनी वर्तमान देनदारियों को सेवा देने में सक्षम नहीं होंगे।

प्र2. एसएमई क्षेत्र को बचाने और उन्हें संकट से निपटने में मदद करने के लिए क्या किया जाना चाहिए?

COVID संकट शायद एक बार एक सदी के Black Swan घटनाओं में है जिससे हम सभी को मिलकर निपटना होगा। विश्व बैंक और IFC की तरह विश्व स्तर पर अन्य प्रमुख सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के बैंकों के साथ सरकारों और संस्थानों ने एसएमई क्षेत्र को अपने श्रम को बनाए रखने और कम से कम 6 महीने तक अपने संचालन को बनाए रखने में मदद करने के लिए प्रमुख प्रोत्साहन पैकेजों की घोषणा की है। भारत में, वित्त मंत्री ने एमएसएमई के लिए ऋण राहत उपायों की घोषणा की और आरबीआई ने प्रमुख ऋण सहजता और तरलता निवारक उपायों की घोषणा की है और बैंकों और छाया बैंकों को आपातकालीन क्रेडिट लाइनें खोलने का भी निर्देश दिया है। कई अन्य महत्वपूर्ण उपाय हैं जिन्हें नीति निर्माताओं द्वारा इस संबंध में किए जाने की आवश्यकता है जैसे कि जुर्माना मुक्त ब्याज भुगतान का विस्तार करने के लिए वित्तीय संस्थानों को प्रोत्साहित करना, परिश्रमी एसएमई को कार्यशील पूंजी पर ब्याज उपविभाग बनाना और इन असाधारण में इस खंड का आकलन करने के लिए वैकल्पिक क्रेडिट स्कोर को अपनाना। बार। एसएमई को वित्त के लिए समय पर पहुंच की भी आवश्यकता होती है। विकास वित्त जिसे अब भारत की ओर निर्देशित किया जा रहा है, को एसएमई क्षेत्र में प्रभावी रूप से प्रसारित करने की आवश्यकता है। इसके अतिरिक्त, बड़ी फर्मों से समय पर भुगतान और संग्रह सुनिश्चित करने के लिए, उन्हें TReDS प्लेटफॉर्म पर ऑनबोर्ड करने के लिए प्रोत्साहित / अनिवार्य किया जाना चाहिए कि यह रुपये के लिए कैसे किया गया है। परिधान खंड में 500 करोड़ + टर्नओवर कॉस।

यदि प्रतिकूलता को एक अवसर में बदल दिया जाए, तो अब से अधिक उपयुक्त समय नहीं हो सकता है। सरकार द्वारा एक बड़ा धक्का, ऋण प्रवाह, जनशक्ति मुद्दों, खराब बुनियादी ढांचे और प्रौद्योगिकी और डिजिटल अंतराल जैसे बुनियादी मुद्दों को संबोधित करने के लिए न केवल इस संकट में एसएमई का समर्थन करेगा, बल्कि उन्हें मजबूत बनाने में भी मदद करेगा।

प्र3. एसएमई को क्या करना चाहिए?

अधिकांश एसएमई ने पहले से ही सभी विवेकपूर्ण खर्चों को रोककर नकदी प्रवाह की रक्षा करने के लिए और अधिक अभिनव बनने के उपायों को अपनाना शुरू कर दिया है, और प्रौद्योगिकी समाधान ढूंढ रहे हैं जो उन्हें अपने पहुंच को बढ़ाने और नए ग्राहकों और पैमाने हासिल करने में मदद कर सकते हैं। यह एसएमई के लिए एक दूसरे के साथ डिजिटल रूप से जुड़ने का एक उपयुक्त समय है और पहले और सबसे पहले इस बात से अवगत रहें कि उनके क्षेत्र में क्या हो रहा है, नीतिगत उपायों को लागू किया जा रहा है और कैसे वे इनका लाभ उठा सकते हैं ताकि स्थिति का सर्वश्रेष्ठ बना सकें। इसके अलावा, एसएमई के लिए वैकल्पिक उधार का लाभ उठाने और विकास पूंजी के लिए अपने क्रेडिट प्रोफाइल में सुधार करने के लिए यह बहुत अच्छा समय है जिसे जल्द ही बढ़ाया जा सकता है।

प्र4.  सोळव – एक B2B डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म एसएमई की मदद करने के लिए क्या कर रहा है?

सोळव के अस्तित्व का बहुत आधार एसएमई को बढ़ने में मदद करना है। सोळव एक वाणिज्य मंच है जो देश भर में छोटे व्यवसायों को जोड़ता है और उन्हें एक मंच, भुगतान, रसद और एंड-टू-एंड पूर्ति के साथ समर्थन करके एक दूसरे के साथ व्यापार करने में मदद करता है।

हम समझते हैं कि इस समय के लिए इस समुदाय के लिए हमारी सेवा अनिवार्य है। COVID-19 लॉकडाउन के संबंधित प्रभावों में से एक आवश्यक आपूर्ति की कमी है। लाखों नागरिक इस बात से चिंतित हैं कि वे अपनी रोजमर्रा की आवश्यक जरूरतों को कैसे पूरा करेंगे। जहां ई-कॉमर्स खिलाड़ी ऑर्डर में अचानक उछाल का सामना करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं, वहीं कई छोटे किराना ने ऑनलाइन-ऑफलाइन हाइब्रिड मॉडल के संचालन का भी विकल्प चुना है। वे सोळव जैसे प्लेटफ़ॉर्म का लाभ उठा रहे हैं, जो इस समय उन्हें उन व्यावसायिक सेवाओं का समर्थन करते हैं जिनकी उन्हें आवश्यकता है।

छोटे किरणों के लिए, उत्पादों की बड़ी आपूर्ति श्रृंखला में दोहन सबसे अच्छे समय में और विशेष रूप से संकट के समय में एक चुनौती है। इसलिए परिवहन और श्रम की खरीद कर रहे हैं, जो अभी बहुत कम आपूर्ति में हैं। जब भारत COVID-19 के खिलाफ लड़ाई में लॉकडाउन में चला गया, तो आवश्यक सामान, जैसे कि किराने का सामान, ताजा उत्पादन और दवा तक पहुंच बाधित हो गई। भारत की आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हुई और छोटे स्थानीय खुदरा विक्रेता और ग्रॉसर्स बड़े निर्माताओं, व्यापारियों और थोक विक्रेताओं के कनेक्शन के बिना आपूर्ति की खरीद करने में असमर्थ थे। छोटे किरणों के लिए, उत्पादों की बड़ी आपूर्ति श्रृंखला में दोहन सबसे अच्छे समय में और विशेष रूप से संकट के समय में एक चुनौती है। इसलिए परिवहन और श्रम की खरीद की जा रही है, जो COVID-19 के नेतृत्व में बंद के दौरान गंभीर रूप से कम आपूर्ति में थे और एक समस्या को जारी रखते हैं क्योंकि अर्थव्यवस्था धीरे-धीरे लॉकडाउन से वापस आ गई है।

सोळव अपने नए तरीकों से एसएमई के लिए बी 2 बी वाणिज्य मंच का लाभ उठाकर इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए लगातार नवाचार कर रहा है। हम अपने नेटवर्क और संसाधनों का उपयोग एक तरफ टियर 2 निर्माताओं और गांवों की सोर्सिंग इकाइयों से जुड़ने के लिए कर रहे हैं और दूसरी ओर वितरण चैनलों के लिए, किरणों, RWA, NGO और छोटे अस्पतालों को आवश्यक सामान पहुंचाने के लिए कर रहे हैं। हमारे एसएमई के माध्यम से हर दिन 20,000 से अधिक परिवारों को आवश्यक आपूर्ति की गई है।

सोळव ने लॉकडाउन की घोषणा के तुरंत बाद एमएसएमई के साथ 1: 1 साक्षात्कार भी आयोजित किया और अध्ययन के निष्कर्षों को प्रकाशित किया (जिसे टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी उद्धृत किया था)। इस अध्ययन ने MSMEs पर COVID-19 संकट के प्रभाव के बारे में बहुत सारी अंतर्दृष्टि का खुलासा करने में मदद की और ऋण की तीव्र कमी जैसी चुनौतियों पर प्रकाश डाला। तब सोळव कम समय के भीतर ऐसी चुनौतियों के समाधान को लागू करने में सक्षम था।

सोळव ने हाल ही में FICCI-CMSME के ​​साथ MSMEs के लिए COVID-19 इमरजेंसी क्रेडिट लाइन प्रोग्राम शुरू करने की भी घोषणा की, जो देश को COVID-19 महामारी से लड़ने में मदद कर रहे हैं। कैश-फ्लो की कमी के कारण एमएसएमई सेगमेंट के लिए राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन ने व्यापार स्थिरता को बुरी तरह प्रभावित किया है। इस परिदृश्य में, COVID-19 इमरजेंसी क्रेडिट लाइन का उद्देश्य MSME क्षेत्र द्वारा सामना किए जा रहे वित्तीय दर्द को कम करना है।

 

Just announcing a MSME stimulus package isn’t enough

By Nitin Mittal

Proper implementation of the stimulus measures for the sector, minus the red tape, is crucial.

The Atmanirbhar stimulus package is a welcome mix of fiscal and monetary support, ease of conducting business processes, as well as some fundamental reforms. However, the stimulus measures do not address current economic needs and will not have an immediate impact.

Introducing clarity in policy communication by making it simple for the end beneficiary, ie the MSMEs, without leaving any room for subjectivity, needs to be urgently taken up by the Central and State governments. For instance, the Finance Ministry’s notification in May, amending the General Finance Rules (GFR) 2017, disallows global tenders to encourage MSMEs to take part in tenders below ₹200 crore, but has bestowed power to the respective departments in ‘exceptional case’ scenarios to consider global tender enquiry.

While 30 per cent of the overall buying demand comes from the government and allied agencies, due to policies being left to individual inference, Indian MSMEs find it hard to supply despite the ‘preference to make in India’ (PMI) guidelines calling for a 100 per cent domestic purchase for certain specified products.

One could argue that the lack of scale that Indian MSMEs have compared to global MSMEs begs for an alternate lending lens to be applied for providing growth capital to MSMEs. This has been amply supported by the Centre through the ‘Fund of Funds’ initiative, but it also has left a major chunk of debt financing to current traditional underwriting measures of the market.

A substantial amount of liquidity has been infused into the banking system in the hope that it will in turn lend more profusely to industries, especially MSMEs. The loan guarantee scheme is another such measure expected to act as a catalyst for lending to this sector, but its success will depend on clear guidelines on implementation to banks and NBFCs, and communication on the steps to leverage this stimulus package for the MSME segment. Banks may turn into growth consultants for MSMEs in the process.

On the demand side, with the latest sustenance boost announced on the heels of the government’s second stimulus package, the Reserve Bank of India (RBI) has provided further relief to borrowers with a three-month loan moratorium extension on top of the three months announced earlier. The repo rate cut of 40 bps is likely to improve credit appetite in the retail segment and help kick-start the economy.

The relief measures this time also included exporters and importers, with the provison of a ₹15,000-crore credit line to EXIM bank, extension of export credit sanctions by three months and a six-month extension for completion of outward remittances for importers. This will go a long way to ease liquidity in the MSME sector, which contributes to 40 per cent of India’s exports.

In this scenario, what MSMEs are asking for can broadly be bucketed as below:

The immediate availability of subsidies, with simplified processes for getting them without hindrance.

Over 95 per cent of our MSMEs are not in the formal finance fold currently; an urgent review of alternate lending mechanisms and credit scoring criteria needs to be undertaken by the Centre to unlock liquidity in the system

Clearance of all due payments stuck with the government and large corporates on priority.

Full restoration of mobility with rules defined and strict adherence monitored, as it is critical to running a business.

For stressed lenders, the challenge of any government-sponsored scheme lies in its last-mile implementation. Delays or denials because of red-tape will make financial institutions wary of any government credit enhancement schemes, and render all the good work done thus far ineffective.

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COVID-19 impact | Reviving post-lockdown MSME manufacturing

By Nitin Mittal

The need of the hour is clarity in policy communication by making it simple for the MSMEs, without leaving any room for subjectivity.

The COVID-19 pandemic has wreaked havoc on the economy. Taking steps to protect our industries and commerce is an immediate and critical need of the hour. To this end, the government recently announced its intention to spend almost 10 percent of India’s gross domestic product (GDP) in the fiscal year 2020 on economic relief measures towards reviving economic growth.

A sector that is reeling under the impact of the COVID-19 outbreak is the Micro, Small and Medium Enterprises (MSME), which contributes to around 35 percent of India’s manufacturing output. The MSME sector, which is also the second-largest employment generator in the country after agriculture, needs special attention from the government.

The stimulus package announced is a mix of fiscal support, monetary support, ease of conducting business processes, as well as some fundamental reforms. The need of the hour is clarity in policy communication by making it simple for the end beneficiaries, the MSMEs, without leaving any room for subjectivity, which needs to be urgently taken up by the central and state governments. For instance, the Finance Ministry’s notification in May, amending the General Finance Rules (GFR) 2017, disallows global tenders to encourage MSMEs to take part in tenders below INR 200 crores, but has bestowed power to respective departments in ‘exceptional case’ scenarios to consider global tender enquiry (GTE). Policies cannot be left to individual inference when a critical step in economic progress like quality sourcing is being sought from domestic players, especially the MSME sector which is gearing to be a major supply chain player for domestic and global markets.

To make this a reality, certain measures with respect to limiting imports may be a necessary step, at least for the foreseeable future. China, for example, is one of our top three trading partners and the trade deficit with the country has increased manifold over the last few years. To stem this, the Government of India proposed amendments in the Customs Act which gives it the power to ban import and export of certain items, “under exceptional circumstances”. These measures are intended to make our supply chains more self-reliant and less dependent on imports, but it is also important to remember the unparalleled scale and capability of manufacturing-driven countries like China; it will take significant policy interventions and drastic structural changes to match their scale, expertise and skills, to be globally competitive.

This is a feat that India is not new to; the challenge has previously been overcome successfully by the likes of the textile industry in India, which is the second largest exporter of textiles in the world. As a country, we must collectively find ways to extrapolate the success stories of the textile industry to other import-heavy industries, while also learning from its failures to kickstart growth in the new normal.

Here are some of the essential steps needed to get the manufacturing MSMEs back on track.

Financial incentives

  • RBI needs to immediately issue guidelines for higher provisioning revisions to banks, in the absence of which liquidity injection into the system is getting delayed
  • Instant availability of subsidies, with simplified processes for getting them without hindrance
  • Speedy cashflow issue resolution through GST refunds and short-term collateral free, low-interest loans to both large corporates and MSMEs

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₹20 lakh crore Economic Stimulus: What will Fund India’s Covid19 Recovery Package?

On Tuesday, May 12, 2020, the Prime Minister of India, Mr. Narendra Modi announced the much-awaited COVID stimulus package of ₹20 lakh crore, which is 10% of the country’s GDP. The question that everyone’s been asking since then – what will be the source of these funds?

We are hazarding some assumptions here: 

  • Reallocation of government spending
  • Tapping domestic private savings
  • Bond purchases
  • Foreign borrowings

The good news is that though the announcements made are worth ₹20 lakh crore, the actual cash outlay by the government and its effect on the fiscal deficit will be far less, at least in the immediate term. That is because, most of the proposals of the government are credit-focused, and others are aimed at easing liquidity concerns for the sectors impacted due to the pandemic. Any costs incurred will initially be covered by financial institutions and will not result in actual cash outflow by the Centre.

Reallocation of government subsidies

Most of the existing government spending goes towards the subsidies, for food, fertiliser and fuel. ₹70,000 crore of these subsidies can be released for increased fiscal spending.

Privatisation of PSUs

Government decided to use equity to raise private funds via large-scale privatisation of PSUs. Not only will this help in raising required funds but will also improve the efficiency ofpublic firms when run jointly by private investors.

The number of PSUs in strategic sectors will be maximum four, remaining will either be privatised or merged. As per the new public sector enterprise policy, all sectors will be open to private sectors and PSUs will play a significant role in defined areas.

Bond markets

In the near-term, the funding burden will fall on bond markets and for it to stabilise markets, RBI’s participation is of prime importance. Market borrowing is likely to rise by at least ₹7-10 lakh crore via domestic means and bond issuances. RBI will play a key role in stepping up bond purchases since absorptive capacity of domestic investors and foreign portfolio investors is limited.

Tax-free bonds

These may turn out to be a preferred investment option for retail investors who are seeking debt mutual fund schemes. These bonds will open a new avenue of participating in a government instrument free of tax.

Foreign borrowings

  • FCNR account deposits

In 2013, at the time of taper tantrum, RBI permitted foreign currency non-residents (FCNR) account deposits, which fetched an inflow of $30 billion in FCNR bank deposits and attracted huge funds from abroad. This strategy may be reimplemented. Moreover, given the fact international borrowing costs are likely to be low, we can be open to foreign currency debt.

  • FDI

Being open to equity investment by foreigners is a smart way to fund our current and urgent needs.

With this in mind; in the fourth tranche of government’s ₹20 lakh crore special economic stimulus package, Finance Minister Nirmala Sitharaman raised the Foreign Direct Investment (FDI) in defence manufacturing to 74% from 49% via automatic route and announced several measures to make defence production self-reliant in the country under Make in India.

Increase in Direct Taxes

Depending on increased taxes is not a great idea as it will only deplete private spending and lead to huge inefficiencies in implementation. Besides that, there is a need of not just the government expenditure but also private consumption and investment for the economy to recover.

ADB’s support of $1.5 billion for Indian MSMEs

To aid Indian MSMEs fight COVID, Asian Development Bank (ADB) is likely to provide $1.5 billion for India’s economic recovery and industrial support particularly to MSMEs.

As per a statement issued by the Ministry of Finance, this relief fund will be a part of the ADB’s existing COVID-19 Active Response and Expenditure Support (CARES) programme that is being offered to India. The support will be facilitated through credit guarantee schemes, MSME integration into global and national value chains through enterprise development centres, and a credit enhancement facility for infrastructure projects.

Though the government has taken several relief measures to make this lockdown easy on small businesses and help them sustain the current period in liquidity and access to credit, this additional help will help revive the faltering MSME sector.

  • SIDBI recently announced 90-day term loans to NBFCs, MFIs, scheduled commercial banks, and small finance banks for offering loans to small businesses.
  • The government is also looking at enhancing the credit guarantee limit to MSMEs to ₹5 lakh crore from around ₹1 lakh crore currently.

ALSO READ: Relief measures by govt in view of COVID-19

The Corona impact would most certainly leave the MSME sector bruised. According to a survey done by Local Circles, over 74% small businesses and start-ups are expected to either shut down or scale down their operations in the next six months. Another survey conducted by them states that 47% of Indian start-ups and SMEs have less than 1 month of cash left, many are out of funds already.

ADB had earlier approved the loan to provide budget support to the government to tackle the adverse health and socio-economic impact of the pandemic. This additional boost of funds will help government strengthen the implementation framework and capacities of the MSME sector.

Loan schemes for MSMEs & farmers by Central Bank of India

Central Bank of India on Apr 29, 2020 launched loan schemes to offer liquidity support to micro, small and medium enterprises (MSMEs), agriculture and self-help group borrowers that have been hit by the COVID-19 lockdown.

  • For MSME borrowers, the bank is offering an emergency credit line of up to 10% of their existing fund based working capital limits, with a maximum limit of ₹50 crore.
  • The duration of these loans is 18 months and the first six months as moratorium.

This scheme will be available till June 30, 2020.

  • Liquidity support to existing Kisan credit card holders or term loan borrowers for crop/fisheries/poultry/dairy/animal husbandry between ₹10,000 to ₹50,000.
  • For Self-help group borrowers, the bank is providing finance of ₹5,000 per member and up to ₹1 lakh per SHGs.

The schemes for agricultural and SHG borrowers will be available till 30 September 2020.

Evolving state of Indian textile and apparel industry under Covid-19 outbreak’s influence

By Nitin Mittal – Founder & CEO, SOLV

India is the 2nd largest producer of Textiles & Apparel in the world, after China. 

The Textile & Apparel Industry in India is in itself, one of the oldest industries and among the highest in terms of output, investment and employment. The sector today employs 100 million+ people directly & through allied sectors, contributes to 5% of Global trade and earns USD 40 billion+ forex, apart from substantial revenue contribution towards the country’s tax revenues. With direct linkages to the rural economy and the agriculture sector, it is estimated that one in every six households in India is either directly or indirectly dependent on it for livelihoods. 

As the nation is undergoing a COVID-19 scare, there is an evident fall in apparel sale. With the closure of shopping malls and stores due to lockdown imposed by the government, and the focus of people shifting from buying lifestyle products to essentials like food and personal care, India’s apparel sector is witnessing a dip in revenues. This sector is in a crisis which must be managed to sustain it.

Today the growth of the Textile & Apparel segment in India is dependent on 20 Million+ MSMEs.

25% of jobs may be lost in Textiles & Apparels Industry and Millions of Small businesses may shut shop in the next 6 months due to the COVID19 Pandemic 

Grim Situation in South India

South India is famous for its textile industry, especially production.

Coimbatore, Tirupur, Salem and Erode in Tamil Nadu, known for this textile belt gobally , generate export revenue of over ₹25,000 crores. Tirupur alone is generates over ₹11,000 crores from more than 10,000 manufacturing units there. In Tamil Nadu there are 4.50 lakh power looms and is the second large to Maharashtra. Tamil Nadu alone represents roughly 45% of India’s entire spinning capability, 22% weaving and 70% of the knitted apparel production capability. Tirupur singlehandedly contributes to almost 50% of total knitted textile and clothing exports, followed by Ludhiana, Kolkata and Delhi NCR.

However, the crisis has brought the production to a grinding halt, because:

–       receivables and new business are affected severely

–       existing orders are getting cancelled or are on hold indefinitely, especially because global trade is yet to begin in the segment again

This has had a massive impact because almost 36% of the produce from Tirupur is exported to Europe and 34% to the US, and the remaining 30% to other parts of the world.

Double Whammy for Offline Stores

As it is the new coronavirus was plummeting sales, the covid-led shutdowns couldn’t have had a worse timinig, with regards to supplies and inventory. For most apparel retailers, the spring summer collection has arrived in stock. Now, with the current scenario – inventory levels are high, and footfalls are zilch – especially at the brick and mortar stores.These businesses are looking for ways and means to reduce the financial strain, which can be done by –

·       managing vendor payment cycles

·       working out the delay in rental pay outs

·       cutting down on extra expenses

Potential Impacts of COVID-19 on the entire Textile & Apparel Industry Value Chain

·       Cotton – Prices are speculated to take a dip

·       Man-Made Fibre – Prices of imported man-made fibre is expected to surge by approx. 30% by Sep 2020 due to China’s production on halt

·       Fabric – Due to decline in exports, the production is expected to decrease

·       Apparel – Due to decline in global demand, the production is speculated to decrease by approx. 18%

·       Yarn – Accounting for 29% of India’s textile trade – the demand and production have taken a hit. Its production is expected to decrease by approx. 15% in the coming quarter

·       Home Textiles – Due to limited or no global contact, this industry has very less impact of downfall triggered by COVID-19. Since, masks, medical gowns and PPE (personal protective equipment) have a high demand, many home textiles companies are pivoting their operations towards PPE production

Online Retailers Holding the Fort 

In comparison to offline stores and malls, fashion ecommerce online stores are operating with an intent to stay connected with their consumers during this tough phase to build stickiness and are also shfting their focus to build a demand pipeline through advance orders.

Manufacturers along with Industry Bodies are Recalibrating Strategies for Utilization of Excess Capacity

Along with majors in the industry like Welspun and re-focussing handloom & khadi industry towards mask production at state level, the governnment and the industry together are coming up with innovative ways to utilize excess capacity while also catering to the urgent demand of WHO recommended critical health protective gear manufacturing.

Policy Recommendations

To protect the textile manufacturers in India from crippling levels of bad debt, what is it that policymakers should do? Broad thoughts below:

·       Direct Wage Support: While the government may not be able to fund the daily wages in every sector, providing textile industry the wage support of ₹5000- ₹7000 per worker for at least one month should be helpful in warding off the problem of layoffs and unemployment to a large extent.

·       GST Refund: The faster way to provide support to a larger group of stakeholders is to refund GST payments made in the last six months. This will cover almost all industries – handloom weavers to shopkeepers and traders. The process has already begun but needs to be speedened to ensure cashflow is available to the micros and small players to sustain themselves, at least for the next 3-6 months. Once the lockdown is lifted, the government could offer a cut on GST rate on all textile products until the industry recovers properly.

·       Incentives for the Export Sector: Given the pandemic, the export will be worst hit, thereby losing further market share. Incentives such as duty drawback on exports made in the previous Financial Year and the current should be considered.

Also interestingly, this is the time peipeline for domestic demand for winter wear that was mostly imported could be sufficed by capacity built by manufacturers in India.

·       Revised credit appraisal lens: Guidelines for loan approval on the basis of credit rating need to be reviewed. Alternate credit lending models for the segment need to be considered seriously in order to fasten credit infusion in the segment.

·       Tax compliance: Given the nationwide shutdown, deadline for taxes should be extended. Also, because of drop in demand, the taxes need to be reviewed to minimise the impact.

·       Benefits to yarn and fabric: Rebate of State and Central Taxes and Levies (RoSCTL), IES and the Merchandise Exports of India Scheme (MEIS) should include cotton yarn and fabrics since the segment supports more than 60% of the textile and apparel segment jobs and more than 80% MSMEs.

·       TReDs compliance for cash-starved businesses: Trade Receivables Discounting System (TReDS) is a digital platform to support micro, small and medium enterprises (MSMEs) to get their bills financed at a competitive rate. Up until now, companies with a turnover of greater than ₹500 crore int he segment were mandated to be on the platform. However, the bar should be reduced to cover ₹100-₹250 crore turnover companies too, to protect the interests of smaller suppliers working with them.

Originally published here.

कृषक समुदाय पर कोविड-19 महामारी का कहर: नुकसान रोकने के फौरी उपायों की माँग

जबकि खेतों में हरी-पीली सरसों झूम रही हैं और गेहूं की बालियाँ पाक कर सुनहरी हो उठी हैं, पूरे भारत में किसानों के लिए इस बार कटाई का मौसम बदला-बदला है। हालांकि, कोविड-19 महामारी के कारण बंदी के चलते किसानों द्वारा बड़े मेहनत बोये अनाज का स्वाद इस बार की बैशाखी में हमें नहीं मिल पाया।

खेती भारत की लगभग दो-तिहाई आबादी के लिए आजीविका का प्राथमिक स्रोत है। वित्तीय साल 2019 में कृषि, वानिकी और मत्स्य पालन से अर्थव्यवस्था में 18.55 लाख करोड़ रुपये की वृद्धि हुयी थी। अगर हम नए सरकारी आंकड़ों को देखें, तो अभी भारत 2019-20 में रिकॉर्ड 106.21 मिलियन टन गेहूं कटाई के लिए तैयार है।

लेकिन देशव्यापी बंदी ने किसानों को दुविधा में डाल रखा है।

  • फसल की कटाई के ऐसे अहम वक्त में मजदूर नहीं मिल सकते और कुशल श्रमिकों की कमी उनके कृषि कार्यों पर प्रतिकूल असर डाल रहे हैं।
  • फसलों के गिरने या मुरझाने से रोकने के लिए किसान खुद ही फसल की कटनी और दौनी की कोशिश कर रहे हैं।
  • फसल कटाई के बाद इसका भंडारण और बिक्री भी एक समस्या बन जाएगी।

ऐसे में, किसान ‘बाजार से बाहर’ बेचने या सीधे ‘खेत से बेचने’ के विकल्प ढूंढ़ रहे हैं, क्योंकि इससे उन्हें कुछ इस तरह अपनी पूंजी के प्रबंधन में मदद मिलेगीः

  • परिवहन लागत में कटौती करना
  • एपीएमसी में किए गए कमीशन और अन्य श्रम शुल्कों से बचना

आगे फसल की बरबादी को रोकने के लिए वक्त की यही मांग है कि सरकार इस स्थिति से निपटने के लिए एक विश्वसनीय रणनीति पेश करे ताकि फसल की आगे बर्बादी और देश में खाद्यान्न की कीमतों में उछाल की आशंका से बचा जा सके। 

किसानों की मदद के लिए सरकार ने कई सारे कदम उठाए हैं, लेकिन इसको लागू करने की तत्परता में कमी है और जमीनी-स्तर पर क्रियान्वयन में कमी है और कमी है देशबंदी के अमल के संवाद में।

  • खेतिहर कामों में छूट :  सरकार ने खेतिहर कामों में छूट दी है। खेतिहर मजदूरों, मंडियों और खरीद एजेंसियों, बुआई से जुड़ी खादों के निर्माण व पैकेजिंग इकाइयों को बंदी के नियमों से मुक्त रखा गया है।
  • सुरक्षा और स्वच्छता सुनिश्चित करना : सरकार का कृषि-शोध संगठन आईसीएआर ने किसानों को खेतों में सामाजिक दूरी और सुरक्षा संबंधी ऐहतियात बरतने को कहा है, मशीन चलाते हुए भी और खेतों में मजदूरों के साथ भी। इन मामलों में किसानों को फसल-प्रबंधन या पशुपालन में कोई दिक्कत होती है, तो वे कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके), आईसीएआर शोध संस्थानों और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में संपर्क कर सकते हैं।
  • प्रधानमंत्री किसान योजनाः अप्रैल में 8.69 करोड़ किसानों को सरकार पीएम-किसान योजना के तहत दो हजार रुपये देगी, ताकि कोरोना वायरस  के कारण हुए देशबंदी से किसानों को राहत मिले। वैसे ही, पीएम-किसान योजना से हर साल किसानों को 6000 रुपये मिलते हैं, उन्हें अब अप्रैल में छूट के तौर पर इसकी पहली किस्त दी जाएगी।
  • आपूर्ति शृंखला की आवाजाही : गृह मंत्रालय ने आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए ई-वाणिज्य के माध्यम से जरूरी सेवाओं की आपूर्ति हेतु कुछ मानक संचालन प्रक्रिया स्थापित किए। इसमें खाद्य, किराने के सामान, फल, सब्जी, दूध उत्पाद से जुड़ी राशन इकाइयां शामिल हैं। इससे किसानों को अपने उत्पाद बेचने में मदद मिलेगी। वहीं, इससे ई-कॉमर्स कंपनियों और बड़ी संगठित खुदरा दुकानों में जरूरी सामान की उपलब्धता बरकरार रहेगी।

बंद के दौरान आपूर्ति सामान्य करने के सरकारी उपायों के बाद फलों और सब्जियों की करीब 1900 मंडियां सुचारु रूप से काम कर रही हैं।

  • निरंतर निगरानी और समन्वय : दिल्ली में मदर डेरी की सफल सब्जी दुकानें, कोलकाता में सफल बांग्ला दुकानें, बेंगलुरु में हॉपकम्स खुदरा दुकानें और चेन्नई और मुंबई में इसी तरह की दुकानें स्थानीय प्रशासन के साथ आपूर्तियों के संचार और समन्वय पर निगरानी रखेंगी। स्थानीय पुलिस, जिला कलेक्टर और परिवहन संगठनों के बीच सुचारू संपर्क और समन्वय के लिए मंडियों में कंट्रोल रूम बनाए गए हैं ।
  • राज्य सरकारों द्वारा खरीदः पंजाब के कृषि सचिव काहन सिंह पन्नू ने किसानों को भरोसा दिलाया है कि राज्य सरकार कटाई की इजाजत देगी और बाजार से हर अनाज को खरीदेगी।

कुछ फौरी राहत व्यवस्थाएं, जो सरकार द्वारा चलाई जा सकती हैं –

  • भारत में करीब 6,900 थोक मंडियां हैं, इनमें अनाज, सब्जी और फल की मंडियां भी हैं। इनमें से 1900 मंडियां चालू हैं। फसल-कटाई के दौरान मांग के अनुरूप आपूर्ति सुनिश्चित हो, इसके लिए ज्यादातर मंडियों को चालू करना महत्वपूर्ण है।
  • श्रम शक्ति में कमी उत्पादन और फसल-प्रसंस्करण पर असर डाल रही है। इससे आमदनी में कमी होगी और खराब हो जाने वाले उत्पादों को भी नुकसान पहुंचेगा।
  • लोगों की आवाजाही पर पाबंदी से वितरण भी प्रभावित हो सकता है, क्योंकि 12 करोड़ या इससे ज्यादा मौसमी खेतिहर मजदूर हैं, जो देहात से शहरी श्रम बाजार की ओर पलायन कर चुके हैं। अब वे लौट नहीं रहे हैं।
  • एपीएमसी के एकाधिकार को भी समाप्त करने की आवश्यकता है और किसानों को सीधे व्यापार करने में मदद करने के लिए ई-नैम जैसे अन्य तरीकों से सीधे किसानों से खरीद करनी होगी, इसके लिए खाद्य-कंपनियों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है।

ई-एनएएम मंडियां

बाजार से बाहर बिक्री विकल्पों को समर्थन देने में ई-एनएएम एक उपयोगी मंच है।

यह भारत में कृषि-उत्पादों के लिए एक ऑनलाइन बिक्री विकल्प है, जो किसानों, व्यापारियों और खरीदारों के बीच उपज की ऑनलाइन बिक्री और सुचारु विपणन की सुविधा प्रदान करता है।

सोशल डिस्‍टेंसिंग और कोरोना वायरस से देशव्यापी बंदी की इस विषम घड़ी में, नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट (ई-एनएएम) देश भर में कृषि व्यापारों को बढ़ावा देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। व्यापारी और खाद्य-कंपनियां इस ई-मंडी या इस ई-मंच से सीधे खरीदारी कर सकते हैं। इससे निम्नलिखित उद्देश्य सुनिश्चित होते हैं –

  • सोशल डिस्‍टेंसिंग – व्यापार, रसीद-चालान और भुगतान, सब कुछ ऑनलाइन होता है।
  • किसानों के लिए प्रतिस्पर्द्धी मूल्य – बिक्री मूल्य प्रतिस्पर्द्धा द्वारा तय होता है, न कि बिचौलियों द्वारा।
  • बेहतर पहुंच – राज्य भर के बाजारों में विक्रेताओं को बेहतर पहुंच मिलती है।
  • वास्तविक समय में जानकारी – खरीदारों को व्यापार, मूल्य और सामान वगैरह की वास्तविक समय में जानकारी मिल जाती है।

ई-एनएएम प्लेटफॉर्म के बारे में जागरूकता फैलाने के क्रम में, सीएसई ई-जीओवी, पंचायतों, नागरिक सेवा केंद्रों आदि संगठनों का लाभ सरकार द्वारा उठाया जा सकता है।

SOLV’s article as published in Indore Samachar, dated Apr 7, 2020

Indore Samchar

Relief measures in view of the COVID-19 outbreak

The Finance Minister, Nirmala Sitharaman announced relief measures for SMEs in view of the COVID-19 outbreak, in the areas of Income Tax, GST, Customs, Corporate Affairs, the Banking Sector and Commerce.

Income Tax

  • Last date for IT returns extended from Mar 31, 2020 to Jun 30, 2020.
  • PAN and Aadhaar linking date has been extended from Mar 31, 2020 to Jun 30, 2020.
  • No additional 10% penalty, if the payment of the Direct Tax under Vivad se Vishwas scheme is made by June 30, 2020.
  • Due dates for notices, intimations, approval or sanction orders, investments in saving instruments, investments for rollover benefit of capital gains under Income Tax Act,  Wealth Tax Act, Black Money Act,  Prohibition of Benami Property Transaction Act, CTT Law, Equalization Levy Law, STT Law, Vivad Se Vishwas Scheme, where the time frame is expiring between Mar 20 to Jun 29, 2020 to be extended to Jun 30, 2020.
  • Interest rate on delayed payments made for advanced tax, TDS, self-assessment tax, TCS, STT, CTT between Mar 20 and Jun 30, 2020 to be reduced from 12% to 9%. Also, no penalty or late fee will be charged for delay during this period.
  • Pending income tax refunds up to ₹5,00,000 to be issued.

GST

  • No late fee, interest or penalty to be charged from companies having annual turnover less than ₹5 crore if they file return by Jun 30, 2020. Companies with turnover more than ₹5 crore will incur interest at 9% per annum instead of 18%.
  • Date for filing GST annual returns extended till the last week of Jun 2020.
  • Due date for issue of notice or approval/sanction order, filing of appeal, submitting return, or any other GST compliant document where the time limit is expiring between Mar 2020 and Jun 29, 2020 has been extended to Jun 30, 2020.
  • Payment date under Sabka Vishwas Scheme has been extended to Jun 30, 2020.
  • Pending refunds for goods and services tax (GST) and customs to benefit 100,000 businesses.

Customs

  • 24X7 custom clearance till the end of Jun 2020.
  • Due date for issue of notice, approval/sanction order, submitting applications or reports, or any documents compliant with the Customs Act expiring between Mar 20 and Jun 29, has been extended till Jun 30, 2020.
  • Pending refunds for customs along with income tax, goods and services tax (GST) worth ₹18,000 crore to be issued.

Financial Services

  • For the next 3 months, debit cardholders can withdraw cash from any other banks’ ATM for free.
  • Minimum balance requirement fee is waived of.
  • Digital charges for trade transactions have been reduced.
  • For MSMEs, the FM urged banks to increase public lending.
  • The moratorium on payment of loan instalments for the next 3 months will not affect the credit rating.
  • Interest on working capital deferred for 3 months will support businesses meet their immediate needs.
  • RBI has enhanced state government’s short-term liquidity needs and increased WMA limit by 30% for all States/UTs.
  • RBI has relaxed export repatriation limits from nine months to 15 months.
  • SBI announced an emergency credit line to meet any liquidity mismatch for its borrowers, along with the additional liquidity facility COVID-19 Emergency Credit Line (CECL) wherein funds up to ₹200 crore will be available till June 30.
  • Oriental Bank of Commerce under the COVID19 Emergency Credit Facility will help SMEs meet temporary liquidity requirement.
  • United Bank of India launched UBI COVID-19 Emergency Credit Facility for its existing MSME, agriculture and other business segment borrowers.
  • SIDBI to provide collateral-free loans up to Rs 50 lakh to MSEs manufacturing medical supplies under its SIDBI Assistance to Facilitate Emergency (SAFE) scheme

Corporate Affairs

  • No additional fees shall be charged for late filing of any document, return, statement during a moratorium period from Apr 1 to Sep 30, 2020.
  • Applicability of Companies Auditor’s Report Order will be made applicable from the next financial year instead of 2019-20 as notified earlier. It will ease the burden on companies and their auditors.
  • Newly incorporated companies have been given an additional time of 6 months to file a declaration for Commencement of Business.
  • Non-compliance of minimum residency period of any Director for at least 182 days shall not be treated as a violation.