जबकि खेतों में हरी-पीली सरसों झूम रही हैं और गेहूं की बालियाँ पाक कर सुनहरी हो उठी हैं, पूरे भारत में किसानों के लिए इस बार कटाई का मौसम बदला-बदला है। हालांकि, कोविड-19 महामारी के कारण बंदी के चलते किसानों द्वारा बड़े मेहनत बोये अनाज का स्वाद इस बार की बैशाखी में हमें नहीं मिल पाया।

खेती भारत की लगभग दो-तिहाई आबादी के लिए आजीविका का प्राथमिक स्रोत है। वित्तीय साल 2019 में कृषि, वानिकी और मत्स्य पालन से अर्थव्यवस्था में 18.55 लाख करोड़ रुपये की वृद्धि हुयी थी। अगर हम नए सरकारी आंकड़ों को देखें, तो अभी भारत 2019-20 में रिकॉर्ड 106.21 मिलियन टन गेहूं कटाई के लिए तैयार है।

लेकिन देशव्यापी बंदी ने किसानों को दुविधा में डाल रखा है।

  • फसल की कटाई के ऐसे अहम वक्त में मजदूर नहीं मिल सकते और कुशल श्रमिकों की कमी उनके कृषि कार्यों पर प्रतिकूल असर डाल रहे हैं।
  • फसलों के गिरने या मुरझाने से रोकने के लिए किसान खुद ही फसल की कटनी और दौनी की कोशिश कर रहे हैं।
  • फसल कटाई के बाद इसका भंडारण और बिक्री भी एक समस्या बन जाएगी।

ऐसे में, किसान ‘बाजार से बाहर’ बेचने या सीधे ‘खेत से बेचने’ के विकल्प ढूंढ़ रहे हैं, क्योंकि इससे उन्हें कुछ इस तरह अपनी पूंजी के प्रबंधन में मदद मिलेगीः

  • परिवहन लागत में कटौती करना
  • एपीएमसी में किए गए कमीशन और अन्य श्रम शुल्कों से बचना

आगे फसल की बरबादी को रोकने के लिए वक्त की यही मांग है कि सरकार इस स्थिति से निपटने के लिए एक विश्वसनीय रणनीति पेश करे ताकि फसल की आगे बर्बादी और देश में खाद्यान्न की कीमतों में उछाल की आशंका से बचा जा सके। 

किसानों की मदद के लिए सरकार ने कई सारे कदम उठाए हैं, लेकिन इसको लागू करने की तत्परता में कमी है और जमीनी-स्तर पर क्रियान्वयन में कमी है और कमी है देशबंदी के अमल के संवाद में।

  • खेतिहर कामों में छूट :  सरकार ने खेतिहर कामों में छूट दी है। खेतिहर मजदूरों, मंडियों और खरीद एजेंसियों, बुआई से जुड़ी खादों के निर्माण व पैकेजिंग इकाइयों को बंदी के नियमों से मुक्त रखा गया है।
  • सुरक्षा और स्वच्छता सुनिश्चित करना : सरकार का कृषि-शोध संगठन आईसीएआर ने किसानों को खेतों में सामाजिक दूरी और सुरक्षा संबंधी ऐहतियात बरतने को कहा है, मशीन चलाते हुए भी और खेतों में मजदूरों के साथ भी। इन मामलों में किसानों को फसल-प्रबंधन या पशुपालन में कोई दिक्कत होती है, तो वे कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके), आईसीएआर शोध संस्थानों और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों में संपर्क कर सकते हैं।
  • प्रधानमंत्री किसान योजनाः अप्रैल में 8.69 करोड़ किसानों को सरकार पीएम-किसान योजना के तहत दो हजार रुपये देगी, ताकि कोरोना वायरस  के कारण हुए देशबंदी से किसानों को राहत मिले। वैसे ही, पीएम-किसान योजना से हर साल किसानों को 6000 रुपये मिलते हैं, उन्हें अब अप्रैल में छूट के तौर पर इसकी पहली किस्त दी जाएगी।
  • आपूर्ति शृंखला की आवाजाही : गृह मंत्रालय ने आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए ई-वाणिज्य के माध्यम से जरूरी सेवाओं की आपूर्ति हेतु कुछ मानक संचालन प्रक्रिया स्थापित किए। इसमें खाद्य, किराने के सामान, फल, सब्जी, दूध उत्पाद से जुड़ी राशन इकाइयां शामिल हैं। इससे किसानों को अपने उत्पाद बेचने में मदद मिलेगी। वहीं, इससे ई-कॉमर्स कंपनियों और बड़ी संगठित खुदरा दुकानों में जरूरी सामान की उपलब्धता बरकरार रहेगी।

बंद के दौरान आपूर्ति सामान्य करने के सरकारी उपायों के बाद फलों और सब्जियों की करीब 1900 मंडियां सुचारु रूप से काम कर रही हैं।

  • निरंतर निगरानी और समन्वय : दिल्ली में मदर डेरी की सफल सब्जी दुकानें, कोलकाता में सफल बांग्ला दुकानें, बेंगलुरु में हॉपकम्स खुदरा दुकानें और चेन्नई और मुंबई में इसी तरह की दुकानें स्थानीय प्रशासन के साथ आपूर्तियों के संचार और समन्वय पर निगरानी रखेंगी। स्थानीय पुलिस, जिला कलेक्टर और परिवहन संगठनों के बीच सुचारू संपर्क और समन्वय के लिए मंडियों में कंट्रोल रूम बनाए गए हैं ।
  • राज्य सरकारों द्वारा खरीदः पंजाब के कृषि सचिव काहन सिंह पन्नू ने किसानों को भरोसा दिलाया है कि राज्य सरकार कटाई की इजाजत देगी और बाजार से हर अनाज को खरीदेगी।

कुछ फौरी राहत व्यवस्थाएं, जो सरकार द्वारा चलाई जा सकती हैं –

  • भारत में करीब 6,900 थोक मंडियां हैं, इनमें अनाज, सब्जी और फल की मंडियां भी हैं। इनमें से 1900 मंडियां चालू हैं। फसल-कटाई के दौरान मांग के अनुरूप आपूर्ति सुनिश्चित हो, इसके लिए ज्यादातर मंडियों को चालू करना महत्वपूर्ण है।
  • श्रम शक्ति में कमी उत्पादन और फसल-प्रसंस्करण पर असर डाल रही है। इससे आमदनी में कमी होगी और खराब हो जाने वाले उत्पादों को भी नुकसान पहुंचेगा।
  • लोगों की आवाजाही पर पाबंदी से वितरण भी प्रभावित हो सकता है, क्योंकि 12 करोड़ या इससे ज्यादा मौसमी खेतिहर मजदूर हैं, जो देहात से शहरी श्रम बाजार की ओर पलायन कर चुके हैं। अब वे लौट नहीं रहे हैं।
  • एपीएमसी के एकाधिकार को भी समाप्त करने की आवश्यकता है और किसानों को सीधे व्यापार करने में मदद करने के लिए ई-नैम जैसे अन्य तरीकों से सीधे किसानों से खरीद करनी होगी, इसके लिए खाद्य-कंपनियों को प्रोत्साहित करने की जरूरत है।

ई-एनएएम मंडियां

बाजार से बाहर बिक्री विकल्पों को समर्थन देने में ई-एनएएम एक उपयोगी मंच है।

यह भारत में कृषि-उत्पादों के लिए एक ऑनलाइन बिक्री विकल्प है, जो किसानों, व्यापारियों और खरीदारों के बीच उपज की ऑनलाइन बिक्री और सुचारु विपणन की सुविधा प्रदान करता है।

सोशल डिस्‍टेंसिंग और कोरोना वायरस से देशव्यापी बंदी की इस विषम घड़ी में, नेशनल एग्रीकल्चर मार्केट (ई-एनएएम) देश भर में कृषि व्यापारों को बढ़ावा देने में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। व्यापारी और खाद्य-कंपनियां इस ई-मंडी या इस ई-मंच से सीधे खरीदारी कर सकते हैं। इससे निम्नलिखित उद्देश्य सुनिश्चित होते हैं –

  • सोशल डिस्‍टेंसिंग – व्यापार, रसीद-चालान और भुगतान, सब कुछ ऑनलाइन होता है।
  • किसानों के लिए प्रतिस्पर्द्धी मूल्य – बिक्री मूल्य प्रतिस्पर्द्धा द्वारा तय होता है, न कि बिचौलियों द्वारा।
  • बेहतर पहुंच – राज्य भर के बाजारों में विक्रेताओं को बेहतर पहुंच मिलती है।
  • वास्तविक समय में जानकारी – खरीदारों को व्यापार, मूल्य और सामान वगैरह की वास्तविक समय में जानकारी मिल जाती है।

ई-एनएएम प्लेटफॉर्म के बारे में जागरूकता फैलाने के क्रम में, सीएसई ई-जीओवी, पंचायतों, नागरिक सेवा केंद्रों आदि संगठनों का लाभ सरकार द्वारा उठाया जा सकता है।

SOLV’s article as published in Indore Samachar, dated Apr 7, 2020

Indore Samchar